Conservation Agriculture

CROPPING PATTERNS
Conservation-Agriculture 

पारंपरिक खेती
(Conservation Agriculture)

Points- 👇
Cropping Patterns
Farming System (Cropping Systems)
Hydroponic Agriculture
Conventional farming

फसल पद्धति
(CROPPING PATTERNS)

👉 किसी खास इलाके में किसान खेती के लिए जिन फसलों के मिश्रण को चुनते हैं, वह उस क्षेत्र का शस्य प्रतिरूप (खेती का तरीका) होता है।

click here- हरित क्रांति के बारे में जानकारी (information about green revolution)

👉 कृषि प्रणाली की बहुतायत भारतीय कृषि की मुख्य विशेषता रही है और इसकी वजह बारिश पर निर्भर खेती और कृषक समाज की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां हैं।

👉 भारत में समय के साथ खेती के तरीकों में बहुत अंतर आया है। लेकिन कृषि भूमि कमोबेश उतनी ही रहने की वजह से, आबादी और शहरीकरण के चलते बढ़ी खाद्यान्न की मांग ने कृषि भूमि पर दबाव बढ़ा दिया है, जिसके परिणाम हैं-फसलों की गहनता और खाद्यान्न फसलों के साथ व्यावसायिक फसलों का प्रतिस्थापन्न।

👉 किसी क्षेत्र के खेती के तरीके मोटे तौर पर कई मृदा और जलवायविक परिमापकों पर निर्भर करते हैं, जो पूरे कृषि-पर्यावरण में किसी फसल या फसल के समूह के पोषण और उपयुक्तता को तय करते हैं।

👉 हालांकि किसान के स्तर पर किसी फसल या खेती के तरीके को चुनते समय संभावित उत्पादकता और मौद्रिक लाभ दिशा-निर्देशक के रूप में काम करते हैं।

👉 फसल और कृषि प्रणाली के चयन के इन फैसलों पर अन्य भी कई चीजों- आधारभूत सुविधाएं, सामाजिक-आर्थिक और तकनीकी कारक; का प्रभाव पड़ता है जो बहुत सूक्ष्म स्तर पर आपस में जुड़े होते हैं। ये कारक हैं:

(i) भौगोलिक कारकः मृदा, खेत, पातन (बारिश आदि), नमी, ऊंचाई, आदि।

(ii) सामाजिक-सांस्कृतिक कारकः खाने की आदतें, त्यौहार, परंपरा, आदि।

(iii) आधारभूत वजहें: सिंचाई, यातायात, भंडारण, व्यापार और विपणन, कटाई के बाद प्रबंधन और प्रसंस्करण, आदि।

(iv) आर्थिक कारकः वित्तीय संसाधनों का आधार, भूमि स्वामित्व, आकार और जमीन का प्रकार, घर की खाद्य आवश्वकताएं, चारा, ईंधन, रेशे और वित्त, श्रम की उपलब्धता आदि।

(v) तकनीकी कारकः बीज और पौधे की उन्नत किस्में, मशीनीकरण, पौधों की सुरक्षा, सूचना तक पहुंच, आदि।

प्रचलित कृषि प्रणाली
(Prevalent Cropping Systems)

👉 कृषि की विविधता अब भी भारतीय कृषि की एक मुख्य विशेषता बनी हुई है। इसके दो मुख्य कारण हो सकते हैं:

भूमि सुधार का क्या अर्थ है?

(i) अब भी 9.28 करोड़ हैक्टेयर या 65 फीसदी कृषि क्षेत्र बारिश पर निर्भर है। बारिश पर निर्भर और सूखे क्षेत्रों में खेती के तरीकों में भारी विविधता है और बीच की फसल का चलन प्रभावी है।

(ii) प्रचलित सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के कारण (जैसे कि कृषि पर बड़ी आबादी की निर्भरता, कृषि भूमि का छोटा आकार, जनसंख्या का अत्यधिक दबाव आदि)।

👉 भारत के करोड़ों किसानों के लिए अपने परिवार के खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना ही पहली प्राथमिकता बना हुआ है। इनकी खेती की जमीन इस तरह हैं:

(a) 5.61 करोड़ बहुत छोटे किसान (एक हेक्टेयर से कम);

(b) 1.79 करोड़ छोटे किसान (एक से दो हेक्टेयर), और;

(c) 1.32 करोड़ अर्द्ध-मध्यम (2 से 4 हेक्टेयर)

➥ साथ मिलकर यह संचालित जोत क्षेत्र के 90 फीसदी बन जाते हैं।

➥ इसका एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि अब भी माना जाता है कि भारत में मोटे तौर पर खेती निर्वाह के लिए ही की जाती है, व्यावसायिक गतिविधि के रूप में नहीं।

➥ निर्वाह के लिए की जाने वाली खेती की एक खास विशेषता यह है कि ज्यादातर किसान अपनी जोत की जमीन पर कई तरह की फसलें उगाते हैं, मुख्यतः अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए और अलग-अलग खेतों पर फसलों के एक समूह को बदल-बदलकर 3-4 साल की अवधि तक लगाते हैं।

➥ ऊपर दी गई इन सब वजहों के चलते कृषि व्यवस्था समय और स्थान में गतिमान रहती है, जिससे पारंपरिक तरीकों के इस्तेमाल से एक बड़े इलाके पर उसके सही विस्तार को ठीक-ठीक मापना संभव नहीं हो पाता।

➥ हालांकि यह अनुमान लगाया गया है कि देश भर में 250 से ज्यादा दोहरी कृषि प्रणालयां अपनाई जाती हैं।

➥ देश के हर जिले में कृषि के विस्तृत विवरण के आधार पर 30 प्रमुख कृषि प्रणालियों (agricultural systems) को चिन्हित किया गया है-

👉 चावल-गेहूं, चावल-चावल, चावल-सरसों, चावल-मूंगफली, बाजरा-चना, बाजरा-सरसों, बाजरा-ज्वार, कपास-गेहूं, कपास-चना, कपास-ज्वार, कपास-कुसुम्भ, कपास-मूंगफली, मकई-गेहूं, मकई-चना, गन्ना-गेहूं, सोयाबीन-गेहूं, ज्वार-ज्वार, अरहर-ज्वार, मूंगफली, ज्वार-चावल, मूंगफली-ज्वार, सोयाबीन-चना।

फसल पद्धति में बदलाव
(Changes in Cropping Patterns)

👉 विभिन्न वजहों से भारतीय किसानों के खेती के तरीकों में समय के साथ बदलाव आया है- हम इसे निम्न तीन चरणों में देख सकत हैं:-

👉 हरित क्रांति पूर्व कालः

Pre-green revolution period

➥ हम देखते हैं कि इस चरण में किसान ऐसी कृषि प्रणाली चुनते हैं (सामान्यतः) जो मुख्यतः सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक वजहों से तय होती है- कमोबेश यह स्थायित्व के करीब होती है क्योंकि इसे उन्होंने अपने पुरखों की प्रयत्न-त्रुटि प्रक्रिया से लंबे समय में विकसित किया है।

हरित क्रांति से पहले तक देशभर में किसान कई फसलों के मिश्रण को समझदारी से उगाते रहे थे।

यह वह समय था जब बड़ी मात्रा में आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर थी।

खेती के तरीकों का ढांचा इतना हठी था कि वह प्रोत्साहन से बदला नहीं जा सकता था।

👉 हरित क्रांति काल:

Green Revolution Period

नई कृषि रणनीति के जादू के तहत, जो हरित क्रांति के नाम से लोकप्रिय है, 1965 के बाद से हम भारतीय किसानों के खेती के तरीकों में बड़ा बदलाव देखते हैं।

इस बदलाव की मुख्य शक्तियां आर्थिक, आधारभूत ढांचागत और तकनीकी थीं।

उच्च पैदावार देने वाले बीजों की शुरुआत, रसायनों और खेती में लगने वाली अन्य चीजों के लिए वित्तीय सहायता, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के प्रावधान के चलते किसानों के फसलों के चयन में भारी बदलाव आया।

हम देखते हैं कि जीआर इलाकों में खेती के तरीकों को बार-बार दोहराया जा रहा है, जिसमें 'गेहूं-चावल' का प्रभुत्व है।

आने वाले समय में भारत सरकार ने कई अन्य फसलों के लिए भी एमएसपी घोषित की, जिसने किसानों की फसलों के चुनाव पर अपना असर छोड़ा।

➥ इस काल की एकमात्र प्रेरणा खाद्य उत्पादन में आत्म-निर्भरता हासिल करना थी, जिससे देश खाद्य सुरक्षा हासिल कर सकता था।

➥ अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध तक भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता हासिल करने में कामयाब हो गया।

➥ जीआर इलाकों में हमें कुछ बड़े किसान उभरते हुए दिखाई देते हैं कम-से-कम जिनके लिए खेती आजीविका भर नहीं रहती-पहली बार भारतीय कृषि में व्यवसायिक आयाम का प्रवेश होता है।

➥ यह ऐसा समय था जब भारत में खेती के पारंपरिक तरीकों में कृषि के नए उपकरणों का प्रवेश हुआ और इसने फसल चयन के भौगोलिक कारण को हल्का कर दिया।

➥ जल्द ही (1996-97 तक) सरकार को समझ आया कि जीआर खेती के तरीके पारिस्थितिकी को बर्बाद करने वाले और अरक्षणीय हैं।

भारत सरकार ने 1997 में चिरस्थाई कृषि के विचार को अपनाया।

👉 सुधार कालः

Reform Period

खेती के तरीकों में एक और बदलाव की लहर 1991 में आर्थिक सुधार शुरू होने के साथ आई, जो कृषि क्षेत्र में नए अवसरों के साथ ही नई चुनौतियां भी लेकर आईः

• खाद्य सुरक्षा के मुद्दे का दबाव नीति निर्माताओं पर बना रहा क्योंकि खाद्यान्न उत्पादन जनसंख्या वृद्धि दर के साथ संगति नहीं बिठा सका।

यह स्थिति तब और गंभीर हो गई जब हाल ही में सरकार ने बहुत बड़ी आबादी को आहार का अधिकार (National Food Security—NFS) प्रदान कर दिया।

भूमंडलीकरण कृषि उत्पाद के निर्यात का नया अवसर लेकर आया साथ ही सस्ते उत्पादन की चुनौती की जिसके लिए खेती का मशीनीकरण अथवा पंजीकरण तथा व्यावसायिक खेती जरूरी हो गई ताकि भारतीय कृषि उत्पाद विश्व बाजार में मुकाबला कर सके।

यह डब्ल्यूटीओ के कृषि संबंधी प्रावधानों के अनुसार जरूरी था। इसके चलते कृषि क्षेत्र में बड़े निवेश की जरूरतें महसूस हुईं।

भारत ने कृषि को उद्योग का दर्जा (2000) देकर कॉरपोरेट तथा ठेके की खेती का रास्ता खोल दिया।

पारिस्थितिकी रूप से धारणीय कृषि समय की जरूरत बन गई क्योंकि जलवायु परिवर्तन सहित वन्य पर्यावरणीय बाधाएं सामने आईं।

भारत सरकार ने वर्ष 2002 में दूसरी हरित क्रांति का प्रस्ताव किया, जिसमें आनुवंशिक रूप से संशोधित आहार (Genetically Modified Foods—GMF) भी शामिल था।

उपरोक्त कारकों के रहते विशेषज्ञ एवं सरकारें देश की उपज पद्धतियों में बड़े परिवर्तनों की अपेक्षा घटने लगीं।

अब मुद्दा यह है कि खेती की प्रविधियों एवं उपज पद्धतियों को धारणीय करने की चुनौती से कैसे निपटा जाए।

विशेषज्ञों ने इसके लिए निम्नलिखित उपाय सुझाए (1990 के दशक के अंत तक), जिन्हें योजना आयोग तथा कृषि मंत्रालय ने लगभग मान लियाः

(i) सही कृषि नीति का पालन हो, जिसमें किसानों को सही किस्म की उपज पद्धति का अनुसरण करने को प्रेरित किया था और इसके पुरस्कार एवं दंड के प्रावधान भी हों।

(ii) सही व्यापार नीति का पालन किया जाए जिससे भारतीय कृषि उत्पादों की नकारात्मक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से बचाए निर्यात को बढ़ाया जा सके।

(iii) उपयुक्त श्रम अधिनियम लाए जाएं, साथ ही भूमि पट्टा तथा अधिग्रहण नीतियां बनाई जाएं ताकि देश के कृषि क्षेत्र में भारतीय एवं विदेशी निजी क्षेत्र को प्रवेश मिल सके।

(iv) डब्ल्यूटीओ पर दबाव बनाया जाए जिससे कि एक तटस्थ एवं न्यायोचित कृषि संबंधी प्रावधान लागू हों, जिनमें भारत की यथार्थ परिस्थितियों का ध्यान रखा जाए-निर्वाह कृषि के लिए खेती तथा उच्च कृषि सब्सिडी संबंधी फसलों का, जो कि विकसित देश अपने फार्म क्षेत्र को अग्रसरित करते हैं।

(v) आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य (Genetically Modified FoodsGMF) की शरूआत के लिए उचित नीतियों का विकास, तथा गैर-जीएमएफ संबंधी शोध एवं विकास को बढ़ाया और इसमें कॉरपोरेट सेक्टर को प्रोत्साहन दिया जाए।

(vi) कृषि नीति फ्रेमवर्क के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को स्थान दिया जाए।

(vii) किसानों की जागरूकता तथा शिक्षा की जरूरत पर जोर दिया जाए, इसमें पंचायती राज संस्थाओं की अंततः भूमिका है।

(viii) पादप संस्करण, कृषि अपशिष्टों पर नियंत्रण, कीट प्रबंधन, वाणिज्यिक उत्पादन एवं शीत इनपुट की वाणिज्यिक उपलब्धता के मुद्दों का समाधान।

(ix) स्थूल और सूक्ष्म स्तर पर कृषि क्षेत्र के लिए ऋण और बीमा पॉलिसियां की सही तरह विकसित हों।

(ix) कृषि क्षेत्र के तत्काल अन्य कारकों का समावेश, जैसे-कृषि उत्पादों के लिए एक राष्ट्रीय बाजार, ऊपरी एवं जमीनी जरूरतें, उपयुक्त आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन, संचार तंत्र, कृषि-प्रसंस्करण उद्योग, भंडारण इत्यादि।

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