भूमि सुधार (Land Reforms meaning)

भूमि सुधार

LAND REFORMS

भूमि सुधार (Land Reforms meaning)
भूमि सुधार (Land Reforms meaning)

| भूमि सुधार का क्या अर्थ है?

(What does land reform mean?)

👉 18 April Current Affairs Questions #83

👉 भारत में भूमि संधार पर आधिकारिक स्वरूप एवं प्रभाव की स्थिति में परिवर्तन आने वाले मुद्दों को जगाने का काम किया है, जिसे दो चरणों में देखा जा सकता है:-

चरण-I (Phase-I)

👉 17 April Current Affairs Questions #82

➥ यह चरण स्वतंत्रता के ठीक बाद आरंभ होता है।

सभी अर्थव्यवस्थाएं औद्योगीकरण से पहले कृषि पर आधारित थीं सिर्फ उनकी अवधि में अंतर था।

ज्योंही प्रजातांत्रिक देश विकास की ओर अग्रसर होने लगे सबसे पहले इन देशों ने कृषि के क्षेत्र में सुधारों को समयबद्ध तरीके से पूरा किया।

चूँकि कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था में भूमि अधिकांश लोगों के लिए आजीविका का साधन था इसलिए इस क्षेत्र में सुधार से अधिकतर लोग लाभान्वित होंगे तथा उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित थी, जिसमें असमानता व्याप्त थी।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1935 में ही इस बात की घोषणा की थी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद भूमि सुधार लागू किए जाएंगे।

अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तरह, जिन्होंने इन सुधारों को पहले लागू किया था।

भारत में भी भूमि सुधार के तीन मुख्य उद्देश्य थेः-

  (what is the purpose of land reform)

(i) भारतीय कृषि में विद्यमान संस्थागत विसंगतियों को दूर करना, जिन्होंने कृषि उत्पादन को बाधित किया है, जैसे-जोत क्षेत्र के आकार, भूमि स्वामित्व, भूमि उत्तराधिकार, काश्तकारी सुधार, मध्यस्थों की समाप्ति, आधुनिक संस्थागत सहायता तथा आधुनिकीकरण।

(ii) भूमि सुधार के एक अन्य उद्देश्य का संबंध भारत में सामाजिक-आर्थिक असमानता से था।

भूमि स्वामित्व में व्याप्त असमानता का नकारात्मक प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ा तथा यह जाति-

व्यवस्था एवं समाज द्वारा प्रदत्त प्रतिष्ठा एवं दर्जी से भी जुड़ा हुआ था।4 देश में 80 प्रतिशत से अधिक लोगों की जीविका इस कृषि व्यवस्था पर आधारित थी।

सरकार इस भूमि स्वामित्व की संरचना को तर्कसंगत और लोक कल्याणकारी बनाना चाहती थी, भूमि सुधार का सामाजिक-राजनीतिक महत्व इसलिए था क्योंकि इसने देश की पुरानी कृषि - व्यवस्था कोविघटित करने का प्रयास किया।

देश में भूमि सुधार एक बड़ा मुद्दा बन गया तथा सरकार द्वारा भूमि को कब्जे में लेने तथा उसे भूमिहीनों को आवंटित करने के कारण इसे बदनामी भी मिली।

(iii) भूमि सुधार का तीसरा उद्देश्य प्रकृति से समसामयिक था, जिसे पर्याप्त सामाजिक-राजनीतिक महत्व नहीं मिला इसका उद्देश्य, कुपोषण तथा खाद्यान्न की कमी को कृषीय उत्पादन में वृद्धि कर दूर करना था।

👉 भूमि सुधार के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सरकार द्वारा तीन मुख्य कदम उठाए गए, जिनके अंतर्गत कई आंतरिक लघु उपाय भी शामिल थे :-

1. मध्यस्थों की समाप्ति (Abolition of Intermediaries)- इस कदम के अन्तर्गत देश में लंबे अरसे से चली आ रही जमींदारी, महालवाड़ी और रैयतवाड़ी व्यवस्थाओं को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया गया।

2. काश्तकारी सुधार (Tenancy Reforms meaning)- इस कदम के अन्तर्गत तीन कार्य किए गए:-

  1. लगान का नियमन (Regulation of rent) :- जोतदारों के द्वारा भूमि - मालिक को दिए जाने वाले लगान की एक दर नियत कर दी गई।
  2. बटाईदारों के हितों की रक्षाः- जमीन जोतने वाले (बटाईदार) का जोत अधिकार (Tenure Right) सुरक्षित रहे, इसकी संस्थागत व्यवस्था की गई।
  3. काश्तकारों को स्वामित्व का अधिकार (Tenant right):- काश्तकारों/बटाईदारों को अंत में उनके द्वारा जोते जा रहे जमीन का स्वामी बनाने की कोशिश की गई।

3. कृषि का पुनर्गठन (Reorganisation of Agriculture)- इस कदम के अंतर्गत कृषि सुधार के लिए कई तर्कसंगत प्रावधानों को शामिल किया गयाः-

  1. भूमि का पुनर्वितरण (land redistribution for agricultural development):- हदबंदी कानून लागू कर भूमिहीन गरीब लोगों के बीच भूमि का पुनर्वितरण कुछ राज्यों को छोड़कर, जैसे-पश्चिम बंगाल, केरल तथा आंध्र प्रदेश के कुछ भागों में विफल रहा; शेष भारत में (जहां भी इसे लागू किया गया) सफल रहा।
  2. भूमि की चकबंदी (Consolidation of Land holding):- यह हरित क्रांति के क्षेत्र में ही सफल रही (जैसे हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) तथा इसमें कई कमियाँ थीं। यह कदम भ्रष्टाचार का भी शिकार है।
  3. सहकारी कृषि (Co-operative Farming meaning):- इस कृषि का सामाजिक, आर्थिक तथा नैतिक आधार था तथा इसका उपयोग बड़े किसानों द्वारा हदबंदी कानून से अपनी भूमि को बचाने के लिए किया गया।
👉 भूमि सुधारों को विशेषज्ञों द्वारा एक असफल कोशिश मानी जाती है। इसे विशेषज्ञों द्वारा मानव इतिहास की सबसे जटिल सामाजिक-आर्थिक समस्या माना जाता है। भूमि सुधार के आँकड़े उत्साहजनक नहीं हैं।

  1. भूमि सुधार द्वारा देश के किसानों को काश्त अधिकार सुनिश्चित किया गया, लेकिन यह भारत की सकल परिचालित भूमि (total operated area) के मात्र 4 प्रतिशत हिस्से पर ही लागू किया जा सका (वर्ष 1992 तक 11 मिलियन काश्तकारों के लिए 14.4 मिलियन हेक्टेयर परिचालित भूमि)।
  2. इसी तरह इस दौरान देश के कुल परिचालित भूमि के मात्र 2 प्रतिशत का ही स्वामित्व पुनर्वितरण किया जा सका (वर्ष 1992 तक 4.76 मिलियन लोगों के बीच 2 मिलियन हेक्टेयर से भी कम क्षेत्र का)।
  3. इस प्रकार भूमि सुधार का लाभ देश के मात्र 6 प्रतिशत भूमि तक ही पहुँच सका तथा इसका सकारात्मक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव भी नगण्य था।
👉 भूमि सुधार की विफलता के कारण ही आने वाले वर्षों में सरकार ने हरित क्रांति की शुरुआत की। सरकार ने उत्पादकता बढ़ाने पर बल दिया, क्योंकि भूमि सुधार इस उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाए थे।

| भूमि सुधारों की विफलता के कारण

(Reasons for Failure of Land Reforms)

➥ विशेषज्ञों के अनुसार भारत में भूमि सुधार की विफलता के कई कारण हैं, इनमें से तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:-

  1. भारत में भूमि पहचान तथा सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है, जबकि अन्य देशों में जहाँ भूमि सुधार सफल रहा है, यह आय अर्जित करने के लिए एक आर्थिक संपत्ति मात्र है;
  2. राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण भी भूमि सुधार एक सफल कार्यक्रम में परिवर्तित नहीं हो सका, तथा;
  3. भारतीय प्रजातांत्रिक व्यवस्था में नेतृत्व की कमी एवं व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण भी भूमि सुधार विफल रहा।

| भूमि सुधार तथा हरित क्रांति

(Land Reforms and Green Revolution)

➥ सरकार ने ज्यों ही हरित क्रांति की शुरुआत की भूमि सुधार का मुद्दा निम्नलिखित कारणों के कारण लगभग हाशिए पर चला गयाः-

  1. भूमि सुधार तथा हरित क्रांति के बीच अंतर्निष्ठ कटुता है, जहाँ एक ओर हरित क्रांति बड़े जोत क्षेत्रों के अनुकूल था, वहीं भूमि सुधार का उद्देश्य बड़े जोत क्षेत्रों के छोटे-छोटे टुकड़े कर भूमिहीनों के बीच बाँटना था।
  2. उच्च वर्ग के भूपतियों द्वारा भूमि सुधार का विरोध किया गया, जबकि हरित क्रांति के लिए कोई ऐसा विरोध नहीं था।
  3. भूमि सुधार का देश पर कोई सकारात्मक सामाजिक - आर्थिक प्रभाव नहीं पड़ा, जबकि हरित क्रांति में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने की क्षमता थी।
  4. PL480 के अंतर्गत छूट प्रदान किए गए खाद्यान्न की आपूर्ति के कारण भारत की स्वतंत्र कूटनीति अवरोधित हो रही थी तथा गेहूँ की नियमित आपूर्ति पर संदेह बना हुआ था।
  5. अंतर्राष्ट्रीय दबाव तथा विश्व बैंक के सुझाव एवं अन्य देशों में हरित क्रान्ति की सफलता के कारण भी भूमि सुधार कार्यक्रम दरकिनार हो गया।

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