भूमि सुधार (Land Reforms meaning #2)

| भूमि सुधार का क्या अर्थ है?

(What does land reform mean?)

चरण-1 (Phase-I) - click here

चरण-2 (Phase-II)

भूमि सुधार (Land Reforms meaning #2)
भूमि सुधार (Land Reforms Part-2)

👉 भूमि सुधार के दूसरे चरण की जड़ें आर्थिक सुधारों में ढूंढी जा सकती हैं।
👉 25 April Current Affair Questions #88
👉 आर्थिक सुधारों ने अर्थव्यवस्था को नई और उभरती हुई हकीकतों से रू-ब-रू करवाया जैसे कि भूमि अधिग्रहण और पट्टा, खाद्य-संबंधी मुद्दे और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के कृषि संबंधी प्रावधान।
👉 24 April Current Affair Questions #87
👉 भारत सरकार के भूमि सुधार मुद्दे पर विचार में हमें बदलाव नजर आता है (आर्थिक सर्वेक्षण 2012-13), एक स्पष्ट तीन चरणों वाली नीति उभरती दिखती है:-

Thoughts on Land Reforms:-

  1. भूमि का सावधानी से मानचित्रण और निर्णायक शीर्षक देना,
  2. भूमि अधिग्रहण की एक न्याय संगत लेकिन तेज प्रक्रिया तैयार करना, और;
  3. जमीन के पट्टे की एक पारदर्शी और प्रभावी नीति लागू करना।

Abolition of zamindari system:-

➥ देश में संभवतः जमीन सबसे मूल्यवान संपत्ति है।

➥ भूमि की तरलता से न सिर्फ कृषि में अधिक संसाधनों का प्रभावी ढंग से फिर से प्रयोग किया जा सकता है, यह भूमि-उपयोग व्यवसाय को स्थापित करने का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती है।

➥ संभवतः यह भूमि का उधार के सहायक के रूप में प्रयोग संभव बना सकता है।

➥ राष्ट्रीय भूमि रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम (एनएल आरएमपी) 2008 में शुरू हुआ था।

➥ इसका उद्देश्य 12वीं योजना के अंत तक जमीन के रिकॉर्डों का नवीनीकरण और डिजिटलीकरण करना है।

➥ अंततः इरादा आनुमानित अधिकार (जिसमें यह कानूनी रूप से जायज है कि किसी भूमि के पंजीकरण में मालिक का नाम शामिल न हो) से निर्णायक अधिकार (जहां यह होता है) की ओर बढ़ना है।

➥ इस प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदुओं को संक्षेप में निम्न प्रकार रखा जा सकता है:-

  1. डिजिटलीकरण से जमीन के सौदों की लागत में भारी कमी आ सकती है, जबकि निर्णायक अधिकार से कानूनी अनिश्चितता, भूमि अधिग्रहण और अधिकार को 'साफ' करने के लिए सरकार की मध्यस्थता की जरूरत खत्म होगी।
  2. कार्यक्रम के महत्व को देखते हुए विभिन्न राज्यों में इसे शुरू किए जाने को तेज करने की जरूरत है- आसान और त्वरित भूमि सौदे विशेषकर छोटे और मध्यम उद्यमों की मदद करेंगे, जिनके पास बड़े उद्यमों जैसा कानूनी और प्रबंधकीय आधार नहीं होता।
  3. भूमि के पट्टे के निषेधात्मक मानक ग्रामीण से शहर की ओर प्रवास को बढ़ा देते हैं क्योंकि ग्रामीण अपनी जमीन को पट्टे पर देने में असमर्थ होते हैं और प्रायः बंजर छोड देते हैं या परिवार के एक सदस्य को खेती करने के लिए छोड़ देते हैं।
  4. प्रतिबंध हटाने से भूमिहीनों (या ज्यादा कुशल जमींदारों) को प्रवास करने वालों से जमीन मिल सकती है। इससे पढ़े-लिखे और कुशल जमीन मालिकों को उद्योग या सेवा क्षेत्र में जाने में सुविधा मिल सकती है।
  5. पट्टेदारों और जमीन मालिकों का अनिवार्य पंजीकरण पट्टेदारों और जमीन मालिकों को सुरक्षा प्रदान करेगा। इस तरह के पट्टा बाजार की सफलता के लिए मालिकों को यह विश्वास होना चाहिए कि लंबे समय तक पट्टेदारी से उनका मालिकाना हक छिन नहीं जाएगा।
  6. एक फलते-फूलते पट्टा बाजार और स्पष्ट मालिकाना हक के बाद मालिकाना अधिकार को मजबूत न किए जाने की बहुत कम वजह रह जाती
  7. सार्वजनिक उद्देश्यों की बड़ी परियोजनाओं, जैसे कि राष्ट्रीय उद्योग और निर्माण क्षेत्र, जो छोटे और मध्यम उद्यमों की स्थापना में मदद करेगा, के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण की जरूरत पड़ेगी।
  8. यह देखते हुए कि चिन्हित जमीन पर रहने वाले लोगों को भारी कीमत चुकानी पडेगी, जिसमें सपंत्ति और आजीविका का नुकसान शामिल है, आर्थिक विकास और विस्थापित लोगों की चुकाई कीमत के बीच एक संतुलन बनाना होगा।
| कृषि विकास के लिए भूमि पुनर्वितरण
(Land redistribution for agricultural development)
➥ इस पर आगे बढ़ते हुए भारत सरकार ने 2013 में भूमि अधिग्रहण विधेयक पास कर दिया।

➥ भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना कानून, 2011 में संशोधन के अलावा इस विधेयक में पट्टे और अधिग्रहण से जुड़े भूमि सुधारों की आवश्यकता पर पारदर्शी, प्रभावी और तेज कानून बनाने का प्रस्ताव था।

➥ साल 2015 में नई केंद्र सरकार ने एक नया भूमि विधेयक (भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनस्र्थापना में पारदर्शिता और न्यायसंगत क्षतिपूर्ति का अधिकार कानून, 2015) प्रस्तावित किया, जिसका लक्ष्य 2013 के भूमि कानून की कमियों को दूर करना था।

➥ इस विधेयक का विपक्षी राजनीतिक दल विरोध कर रहे हैं (संसद को अभी इस विधेयक को पास करना है, हालांकि सरकार इसमें 10 संशोधन कर चुकी है)।

➥ देश भूमि अधिग्रहण की तेज प्रक्रिया को तैयार करने में जमीन मालिकों (किसानों) की आर्थिक सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकता- इससे संबंधित कानून को पारदर्शी, न्यायसंगत, प्रभावी और तेज भी होना चाहिए।

➥ इस चरण के महीन बिंदुओं को संक्षेप में इस तरह रखा जा सकता है:-

Zamindari system abolished by the act:-

  1. विगत कुछ वर्षों में भूमि अधिग्रहण के प्रयासों पर भारत के विभिन्न राज्यों में किसानों के विरोध को देखते हुए पट्टा देना एक बेहतर विकल्प लगता है।
  2. पुनः, अगर देश को निजी क्षेत्र (घरेलू और विदेशी दोनों) से निवेश आकर्षित करना है तो जमीन का पट्टा देना अधिग्रहण के मुकाबले बेहतर विकल्प है।
  3. भारत में कॉर्पोरेट कृषि बड़े पैमाने पर शुरू नहीं हो पाई है, विशेषकर खाद्यान्न उत्पादन में, जिसकी भारत को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और विशेषकर अंतर्राष्ट्रीय अनाज बाजार में प्रतियोगिता के लिए जरूरत है।
  4. यह बड़ी आबादी को भोजन का अधिकार दिए जाने के संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो गया है।
  5. 'पट्टा देने' को प्राथमिकता दिए जाने से कई समस्याएं हल हो सकती हैं:
| पट्टे के लिए कृषि भूमि
Agriculture land for lease
  • (a) इससे मालिकाना हक मौजूदा किसानों के पास ही रहेगा;
  • (b) यह किसानों में व्यापक भूमिहीनता और बेरोजगारी को रोकेगा;
  • (c) किसान को आय का एक नियमित जरिया मिल जाएगा (इस बीच-वे-कोई कौशल विकसित कर उद्योग में बेहतर नौकरी पा सकते हैं), और
  • (d) इससे सार्वजनिक और निजी उद्देश्यों के लिए जमीन आसानी से उपलब्ध हो जाएगी।
6. वैश्वीकरण के बाद अगर देश को कृषि क्षेत्र - तक लाभ पहुंचाने हैं तो इसे अपने कृषि उत्पादन को अतिरिक्त के स्तर तक पहुंचाना होगा और इसके लिए भारत को निजी क्षेत्र की निवेश क्षमताओं का दोहन करना होगा।

7. यह तब तक नहीं हो सकता जब तक देश एक प्रभावी भूमि पट्टा देने और अधिग्रहण की नीति लागू नहीं

करती।

8. पिछले कुछ समय से 'निर्माण क्षेत्र' और 'स्मार्ट सिटी' के विकास (Promotion) पर जोर दिया जा रहा है, जो भूमि अधिग्रहण की सुचारू और तेज प्रक्रिया पर बहुत ज्यादा निर्भर है।

9. उद्योग क्षेत्र का सबसे अच्छे स्तर तक विस्तार किए बिना, कृषि क्षेत्र एक लाभकारी पेशे में बदल सकता है- देश को कृषि क्षेत्र के अतिरिक्त मानव श्रम को सुचारू रूप से उद्योग क्षेत्र में भेजने की आवश्यकता है।

10. भूमि अधिग्रहण के मुद्दे को 'पर्यावरणीय मुद्दे' के साथ एक तार्किक समीकरण बैठाना होगा, ताकि विकास की प्रक्रिया स्थाई रूप से चल सके (नीति आयोग का नजरिया इस संबंध में सही है)।

➥ यह बात ध्यान देने योग्य है कि जहां भारत सरकार ने अपना ध्यान भूमि सुधारों पर लगा दिया है, भारत के राज्य अब भी पहले चरण के भूमि सुधारों को ही जारी रखने और तेज करने की कोशिश कर रहे है (लेकिन देश के जमीन मालिकों की ओर से पर्याप्त विरोध के चलते यह प्रक्रिया जारी रहती नहीं लग रही है, राजनीतिक कारणों से)।

| कृषि संपत्ति और जोत-क्षेत्र -

(Agriculture Holdings Or Tillage area)

➥ भारत में कृषि संपत्ति का औसत आकार जनसंख्या वृद्धि के कारण निरंतर घटता जा रहा है।

➥ इन संपत्तियों के बँटने के कारण इनकी संख्या में वृद्धि हुई है तथा इनका आकार भी छोटा हो गया है।

➥ नवीनतम कृषि जनगणना 2010-11 के अनुसार (As per latest agricultural census 2010-11) :-

कृषि सर्वेक्षण (agriculture survey):-

  1. देश भर में सक्रिय जोतों की संख्या 2005-06 के 158.32 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 2010-11 में 138 मि.हे. (6.61 प्रतिशत की वृद्धि) हो गई।
  2. क्रियाशील क्षेत्र में 2005-06 के 158.32 मि.हे. से 2010-11 में 159.18 मि.हे. की मामूली वृद्धि (0.54 प्रतिशत वृद्धि) देखी गई।
  3. क्रियाशील क्षेत्र में वृद्धि का कारण झारखंड राज्य का कृषि जनगणना 2010-11 में पहली बार भाग लेना है, क्योंकि यह राज्य वर्ष 2000 में अस्तित्व में आया।
  4. क्रियाशील जोत का औसत आकार 2005-06 के 1.23 हे. के मुकाबले घटकर 2010-11 में - 1.16 हे. रह गया।
  5. महिला जोतदारों की प्रतिशत हिस्सेदारी में इजाफा हुआ है - 2005-06 में 11.70 से बढ़कर 2010-11 में 12.79, इसी दौरान क्रियाशील क्षेत्र क्रमशः 9.33 तथा 10.36 था।
  6. लघु एवं सीमांत जोत को मिला दें (2.00 हे. से नीचे) तो 2010-11 में यह 84.97 प्रतिशत होता है, जबकि 2005-06 में यह 83.29 था, वर्तमान कृषि जनगणना में 44.31 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ (2005-06 के 41.14 प्रतिशत के मुकाबले)।
  7. बड़ी जोत (10.00 हे. तथा अधिक) 2010-11 में कुल जोत का 0.73 प्रतिशत थी जबकि इसकी हिस्सेदारी 10.92 प्रतिशत थी।
  8. दूसरी ओर 2005-06 की कृषि जनगणना में यह आंकड़ा 0.85 प्रतिशत तथा 11.82 प्रतिशत था।
  9. भूमि की जोत में विभिन्न सामाजिक समूहों की हिस्सेदारी रही - अनु. जाति के लिए 12.40 प्रतिशत, अनु. जनजाति के लिए 8.71 प्रतिशत, संस्थानिक 0.18 प्रतिशत तथा 78.72 प्रतिशत अन्य के लिए।
  10. देशभर में 137.76 मि. क्रियाशील जोतों में उत्तर प्रदेश (22.93 मिलियन) सबसे ऊपर है, उसके बाद बिहार (16.19 मिलियन) तथा महाराष्ट्र (13.70 मिलियन) हैं।
  11. देशभर में कुल 159.18 मिलियन हेक्टेयर क्रियाशील क्षेत्र में से सबसे बड़ा योगदान राजस्थान (21.14 मि. हे) का है तथा उसके बाद महाराष्ट्र (19.84 मि.हे.) तथा उत्तर प्रदेश (17.09 मि.हे.) आते हैं।

➥ कृषि जोत/क्षेत्र संपत्ति को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:

1. आर्थिक जोत-क्षेत्र/संपत्ति (Economic Holdings)-

➥ यह वह संपत्ति है, जो किसी परिवार के न्यूनतम जीवनस्तर को कायम रखने के लिए आवश्यक है। दूसरे शब्दों में, आर्थिक जोत-क्षेत्र लाभकारी कृषि के लिए न्यूनतम आवश्यक क्षेत्र है।

2. पारिवारिक जोत-क्षेत्र/संपत्ति ( Family Holding)-

➥ यह वह जोत-क्षेत्र है, जो किसी औसत आकार के परिवार के लिए न तो बड़ा होता है और न ही छोटा। यह जोत-क्षेत्र परिवार के सभी सदस्यों को रोजगार प्रदान करता है।

3. अनुकूलतम जोत-क्षेत्र/सम्पत्ति (Optimum Holding)-

➥ किसी परिवार के स्वामित्व के अधीन अधिकतम जोत-क्षेत्र को अनुकूलतम जोत-क्षेत्र कहते हैं।

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