राजस्थान का मध्यवर्ती अरावली प्रदेश (Rajasthan's intermediate Aravali region)

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  राजस्थान का मध्यवर्ती अरावली प्रदेश

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अरावली पर्वतमाला राज्य में गोडवाना लैण्ड का अवशेष है।
अरावली पर्वतमाला विश्व की प्राचीनतम वलित पर्वतमाला है, इसका मूल भाग नष्ट हो चुका है।
वर्तमान अरावली मूल अरावली का खण्ड मात्र है। इसी कारण इसे अवशिष्ट पर्वत श्रृंखला कहा जाता है।

अरावली पर्वत माला के उपनाम -

उपनाम ➞ क्षेत्र 
1. परिपत्र            विष्णु पुराण में 
2. मेरू              ➞    
भौगोलिक भाषा में 
3. आबु गूलाम  ➞    सिरोही में
4. एडावेटा ➞   राजस्थानी भाषा तथा उदयपुर जिले में
5. मालाणी ➞   जालौर तथा बालोतरा में
6. आडावाला पर्वत➞बूंदी में 
7. मालखेत की पहाडियां सीकर में
8. अरावली गुजरात में

अरावली पर्वतमाला का विस्तार एवं स्थिति-

अरावली पर्वतमाला सुदूर दक्षिणतम अरब सागर के मिनीकॉय द्वीप से प्रारम्भ होता है।
अरब सागर अरावली का उत्पति स्थल या पिता कहा जाता है।
अरावली की जडें अरब सागर से शुरू होती है।
अरावली की कुल लम्बाई 692 किलोमीटर है जो पालनपुर (गुजरात) से पालम (दिल्ली) तक विस्तृत है।
अरावली पर्वतमाला का विस्तार तीन राज्यों में है । गुजरात, राजस्थान तथा हरियाणा
अरावली पर्वत माला प्री-केम्ब्रियन युग की है।

अरावली पर्वतमाला दिल्ली में पालम हवाई अड्डा के पास समाप्त होती है। जहां रायसिंह की पहाड़ियों पर राष्ट्रीय भवन बना हुआ है। राष्ट्रपति भवन का पूर्व नाम वायसरिंगल लॉज था। इसका नक्शा सर्वप्रथम 1911 में एडवर्ड लुडवीन द्वारा बनाया गया। इसमें रहने वाला प्रथम व्यक्ति लार्ड इरविन था। राष्ट्रपति भवन के निर्माण में राजस्थान के धौलपुर तथा करौली जिले के लाल पत्थरों का प्रयोग किया गया है।

अरावली पर्वतमाला के भू-गर्भिक बनावट का अध्ययन करने वाला प्रथम व्यक्ति ए.एम. हेरोन था जिसने 1923 में इसका अध्ययन किया। इसकी तुलना अमरीका के अल्पेशियन पर्वतों से की जाती है।

नोट :- अरावली को नदीयों की जन्मस्थली कहा जाता है।

राजस्थान में अरावली का विस्तार-

राजस्थान में अरावली सर्वप्रथम सिरोही जिले में प्रवेश करती है, तथा यह खेड़ब्रह्मा (सिरोही) से खेतड़ी सिंघाना (झुन्झनु) तक श्रृंखलाबद्ध है। किन्तु खेतड़ी से आगे इसके टुकडे प्रारम्भ हो जाते है।

राजस्थान में अरावली पर्वतमाला की कुल लम्बाई 550 किलोमीटर है । अरावली पर्वतमाला की कुल लम्बाई का राजस्थान में 79.48% (लगभग 80% भाग) भाग आता है ।

अरावली पर्वतमाला का आकार तानपुरे वाद्ययंत्र के समान है।

अरावली पर्वतमाला का विस्तार राज्य के 17 जिलों है । यह राज्य को दो भागों में विभाजित करती है । पूर्वी भाग व पश्चिमी भाग ।

अरावली पर्वतमाला के पश्चिम में 13 जिले आते है । (12 मरूस्थली व 1 सिरोही)

अरावली पर्वतमाला के पश्चिम में लगभग 60% भूभाग पर राज्य की 40% जनसंख्या निवास करती है ।

अरावली पर्वतमाला के पूर्व में राज्य के 20 जिले आते है (अरावली सहित गैर मरूस्थलीय जिले) राजस्थान के कुल गैर मरूस्थली जिले 21 है। अरावली पर्वतमाला के पूर्व में 20 तथा 1 सिरोही ।

अरावली पर्वतमाला का सर्वाधिक विस्तार उदयपुर जिले में है व सबसे कम विस्तार अजमेर जिले में है। अरावली पर्वतमाला का सबसे ऊँचा पॉइन्ट गुरूशिखर सिरोही जिले में है जबकि सबसे नीचा पॉइन्ट अजमेर जिले में पुष्कर घाटी है ।

अरावली पर्वतमाला राज्य की नदीयों को 2 भागों में विभाजित करती है। पश्चिमी भाग तथा पूर्वी भाग। अरावली के पश्चिम में बहने वाली नदीयाँ अपना जल अरब सागर को तथा अरावली के पूर्व में बहने वाली नदीयां अपना जल बंगाल की खाड़ी को लेकर जाती है ।

अरावली पर्वतमाला पश्चिमी मरूस्थल को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकती है।

अरावली पर्वतमाला बंगाल की खाड़ी से आने वाले मानसून को रोककर वर्षा में सहायक होती है। अरावली पर्वतमाला से होने वाला सबसे बड़ा नुकसान यह है, कि अरावली पर्वतमाला की स्थिति अरबसागर के मानसून के समानान्तर होने के कारण यह मानसून (अरब सागर) बिना वर्षा किये गुजर जाता है ।

अरावली पर्वतमाला में पर्वतीय चट्टानों के टुटने से पर्वतीय मिट्टी का निर्माण होता है, एवं जिस पर्वतीय मिट्टी में चुने की अधिकता होती है, उसे लेटेराइट मिट्टी कहा जाता है। अतः इस (अरावली) क्षेत्र में पायी जाने वाली मिट्टी लेटेराइट मिट्टी है।

अरावली पर्वतमाला का विस्तार दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है। अरावली पर्वतमाला की चौड़ाई और ऊँचाई लगातार दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर कम होती जाती है, जबकि इसकी चौड़ाई व ऊँचाई उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर बढ़ती जाती है ।

अरावली पर्वतमाला एक महान जल विभाजक रेखा का कार्य करती है ।

अरावली पर्वत माला राज्य के कुल भूभाग का 9% भाग है । जिस पर सम्पूर्ण राज्य की 10% जनसंख्या निवास करती है ।

अरावली पर्वतमाला में मुख्य रूप से ढलान पहाड़ियों पर मक्का की खेती की जाती है। इस क्षेत्र में उष्ण कटिबंधीय वन पाये जाते है । इस क्षेत्र में कंकरीली/लाल मिट्टी पाई जाती है।

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से उंचाई तथा विस्तार के आधार पर हम अरावली पर्वतमाला को तीन भागों में विभाजित करते है-

1. उत्तरी अरावली पर्वतमाला

2. मध्य अरावली पर्वतमाला

3. दक्षिणी अरावली पर्वतमाला

उत्तरी अरावली पर्वतमाला :- सांभर के उत्तर का क्षेत्र उत्तरी अरावली कहलाता है। उत्तरी अरावली की सबसे उँची चोटी सीकर जिले में स्थित रघुनाथगढ़ है जिसकी उंचाई 1055 मीटर है।

मध्य अरावली पर्वतमाला :- सांभर से देवगढ़ (राजसमन्द) तक का क्षेत्र मध्य अरावली कहलाता है। इस क्षेत्र की सबसे उँची चोटी मेरामजी या टाड़गढ़ (अजमेर) है जो अजमेर जिले में स्थित है। जिसकी उंचाई 933.72 मीटर है ।

नोट :- मध्य अरावली का केन्द्रीय भाग तारागढ़ है जिसकी उंचाई 870 मीटर है ।

मध्य अरावली में कटे-फटे तंग रास्तों को दर्रा कहा जाता है। मध्य अरावली के प्रमुख दर्रे इस प्रकार है

दर्रा

कचावली, पीपली, उदावरी, स्वरूपघाट ये चारों दर्रे अजमेर को मारवाड़ (जोधपुर) से जोड़ते है ।

बर दर्रा आगरा से अहमदाबाद को जोड़ता है।

पखारिया दर्रा अजमेर से मसूदा को जोड़ता है।

शिवपूर घाट व सुरा घाट दर्रा अजमेर से मेवाड़ को जोड़ता है।

दक्षिणी अरावली पर्वतमाला :- देवगढ़ (राजसमन्द) से दक्षिण का क्षेत्र दक्षिणी अरावली कहलाता है। दक्षिणी अरावली की सबसे उंची चोटी गुरूशिखर है, जो कि अरावली की सबसे ऊची चोटी भी है, जो सिरोही जिले में स्थित है जिसकी ऊँचाई 1722/1727 मीटर है।

नोट :- गुरूशिखर जिसे गुरूमाथा भी कहा जाता है। हिमालय पर्वत के माउन्ट एवरेस्ट तथा पश्चिमी घाट के निलगिरी पहाड़ियों के मध्य की सबसे ऊँची चोटी है । कर्नल टॉड़ ने यहां संतों को तपस्या करते हुए देखा था इससे प्रभावित होकर कर्नल टॉड ने इसे संतों का शिखर नाम दिया । इसकी ऊँचाई 1722/1727 मीटर है । इसकी चोटी पर दत्तात्रेय ऋषि का मन्दिर बना हुआ है। यदि इस मन्दिर की ऊँचाई को शामिल करें तो गुरूशिखर की कुल ऊँचाई 1727 मीटर होती है। गुरूशिखर के नीचे राज्य का एकमात्र पर्वतीय पर्यटक स्थल माउन्ट आबू स्थित है।

दक्षिण अरावली में तंग रास्तों अथवा दरों को नाल कहा जाता है। दक्षिणी अरावली के प्रमुख दर्रे या नाल इस प्रकार है

नाल

केवड़ा की नाल/हाथी नाल - उदयपुर

हाथीगुड़ा की नाल – यह राजसमन्द जिले में नेशनल हाईवे 76 पर स्थित है जो कुम्भलगढ़ जाने का मार्ग प्रदान करती है।

पगल्या/जीलवाड़ा की नाल - यह नाल दक्षिण-पश्चिम मेवाड़ से गुजरात जाने का मार्ग प्रदान करती है।

अहमदाबाद-उदयपुर

देसूरी की नाल – यह पाली जिले में स्थित है, यह नाल देसूरी-पाली से चारभुजा राजसमन्द जाने का मार्ग प्रदान करती है ।

फुलवारी की नाल – यह नाल उदयपुर जिले में स्थित है, यह नाल वन्य जीव अभ्यारण्य तथा मानसी वाकल बेसिन के लिये प्रसिद्ध है ।

नोट :- राज्य में सर्वाधिक नदीयों का उद्गम अरावली पर्वतीय प्रदेश से हाता है। जबकि सर्वाधिक नदीयाँ कोटा संभाग में बहती है।


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